।।अध्याय सारांश ।।

 

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।।प्रथम अध्याय।।

अर्जुन विषाद योग

प्रथम अध्याय

अप्रतिभ,अविचल,अकल्पित,इस समर का रंग है।
रिश्तों की परिभासा लख प्रभु पार्थ विस्मित दँग है।

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।।द्वितीय अध्याय।।

श्री कृष्ण अर्जुन संवाद सांख्य योग अध्याय

द्वितीय अध्याय

ज्ञान कर्म सन्यास तीनो एक है अंतरंग हैं,
जीव स्थितप्रज्ञ के कटजाते सब ंभवफन्द हैं।

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।।तृतीय अध्याय।।

श्री कृष्ण अर्जुन कर्मयोग संवाद अध्याय

तृतीय अध्याय

पञ्चभूती संतुलन से प्रकृति अति कमनीय है।
छेड़ मनमानी से अतिदुष्कर कठिन दमनीय है।

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।।चतुर्थ अध्याय।।

श्री कृष्ण अर्जुन संवाद ज्ञान कर्म सन्यास योग;

चतुर्थ अध्याय

नित्य संचालक स्वयंही ब्रम्ह है सविवेक है।
इस तरह के जीव को होता नहीं अतिरेक है।

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।।पंचम अध्याय।।

श्री कृष्ण अर्जुन संवाद कर्म सन्यास योग

पंचम अध्याय

कर्म से करना पलायन योग का आशय नहीं,
कर्मसे योगी ही योगी श्रेस्ठ है संसय नही।

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।।षष्ठम अध्याय।।

श्री कृष्ण अर्जुन ' कर्मयोग ' और ' सांख्य योग ' संवाद

षष्ठम अध्याय

कुछ सुलगते प्रश्न हैं ,असहाय सा वैचित्र है।
अब किसे मै शत्रु मानू कौन मेरे मित्र हैं।

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।।सप्तम अध्याय।।

श्री कृष्ण अर्जुन संवाद ज्ञान-विज्ञान योग अध्याय

सप्तम अध्याय

सत्य का अब तक नहीं केशव हुआ संज्ञान है।
तत्व क्या है सार क्या,क्या ज्ञान क्या विज्ञान है।

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।।अष्टम अध्याय।।

श्री कृष्ण अर्जुन संवाद अक्षर ब्रम्ह योग अध्याय

अष्टम अध्याय

अच्छा माधव यह न कहना बुद्धि मेरी अज्ञ है।
ब्रह्म कर्म आध्यत्म क्या अधिभूत क्या अधियज्ञ है।

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।। नवम अध्याय।।

श्री कृष्ण अर्जुन संवाद राज विद्या, राज ग्रह्य योग अध्याय

नवम अध्याय

जागरन सा हो गया है अब न बुद्धि सुप्त है।
अबभी कुछ ऐसा है मोहन जो कि हमसे गुप्त है।

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।।दशम अध्याय।।

श्री कृष्ण अर्जुन संवाद ब्रम्ह विद्या योग शास्त्र अध्याय

दशम अध्याय

किसकी ये विद्या है केशव किसके सब सन्दर्भ है।
किसके संचालन से चलता ये चराचर सर्व है।

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।।एकादश अध्याय।।

श्री कृष्ण अर्जुन संवाद विश्व रूप दर्शन योग अध्याय

एकादश अध्याय

चलो माना आप हैं जितना जहाँ तक ज्ञात है।
किंतु यह सम्भाव्य क्योंकर है असंभव बात है।

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।।द्वादश अध्याय।।

श्री कृष्ण अर्जुन संवाद भक्ति योग अध्याय

द्वादश अध्याय

एक पैर से खड़े हो करते निसदिन ध्यान।
वे प्रिय हैं प्रभु के निकट या क़ि भक्त अनजान।

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।।त्रयोदश अध्याय।।

श्री कृष्ण अर्जुन संवाद क्षेत्र क्षेत्रज्ञ विभाग योग अध्याय

त्रयोदश अध्याय

क्या ये मानव देह प्रभु का क्षेत्र है यह मान लूँ।
रकौन है क्षेत्रज्ञ ,किससे पूछू किससे ज्ञान लूँ।

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।।चतुर्दशो अध्याय।।

श्री कृष्ण अर्जुन संवाद त्रिगुण विभाग योग अध्याय

चतुर्दशो अध्याय

एक संसाधन से निर्मित सबकी मानव देह है।
सत्व रज,तम के गुणों का भिन्न क्योंकर गेह है।

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।।पंचदश अध्याय।।

श्री कृष्ण अर्जुन पुरुषोत्तम योग अध्याय

पंचदश अध्याय

देव दानव या कि मानव मे लघुत्तंम कोंन है।
पुरूष पौरुष पूर्णइस जग का पुरुषोत्तम कौन है।

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।।षोडष अध्याय।।

श्री कृष्ण अर्जुन संवाद देवासुर संपत्ति विभाग योग अध्याय

षोडष अध्याय

सारे जातक एक जैसे एक सबकी आत्मा।
सुर असुर के भाग दो मे क्यों बंटे जीवात्मा।

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।।सप्तदश अध्याय।।

श्री कृष्ण अर्जुन संवाद श्रद्धात्रय विभाग योग अध्याय

सप्तदश अध्याय

देख़ो अर्जुन बात समझो सभी श्रद्धारूप हैं।
जो भजे जिस रूप से हो जाता तद्अनुरूप है।

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।।अष्टदश अध्याय।।

श्री कृष्ण अर्जुन संवाद मोक्ष सन्यास योग अध्याय

अष्टदश अध्याय

गुणगुणाकर गुनगुना गीता गहर गम्भीर हैं,
सत्य कह कौन्तेय सुन संसय है या कि अधीर है

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